कन्हैया आता ज़रूर है…
कहते हैं—
उसके घर देर है, अंधेर नहीं।
तो कान्हा,
क्या होता अगर तुम
द्रौपदी के चीरहरण के बाद आते?
जब उसकी लाज लुट चुकी होती,
जब उसकी पुकार थक चुकी होती,
जब सभा में सब मौन हो चुके होते?
क्या तब भी लोग तुम्हें
यूँ ही पूजते?
क्या तब भी तुम
तारणहार कहलाते?
और मीरा के विष का क्या, कान्हा?
अगर तुम उसके विष पी लेने के बाद आते,
तो क्या उसकी भक्ति का अर्थ वही रहता?
क्या तब भी लोग कहते—
“जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ कृष्ण स्वयं आते हैं?”
मेरी नैया भी डूब रही है, कान्हा…
कब से इस मझधार में फँसी हूँ मैं।
हाथ थक गए हैं,
आस टूटने लगी है,
और तुम…
तुम जाने क्यों
अब भी किनारे खड़े हो।
कभी-कभी लगता है,
शायद तुम इंतज़ार कर रहे हो
मेरे पूरी तरह डूब जाने का—
ताकि फिर आकर कह सको,
“देखो, मैं तो था ही।”
मानती हूँ,
मैं द्रौपदी जैसी तुम्हारी सखी नहीं,
न मीरा जैसी तुम्हारी भक्त।
न मेरे पास उसकी आस्था है,
न उसकी समर्पण की शक्ति।
पर कान्हा,
क्या तुम्हें पाने के लिए
द्रौपदी होना ज़रूरी है?
क्या तुम्हें पुकारने के लिए
मीरा होना ज़रूरी है?
अगर मैं बस तुम्हारी हूँ,
तो क्या इतना काफ़ी नहीं?
फिर क्यों
मेरे रथ को
बीच रणभूमि में छोड़ दिया तुमने?
क्यों मेरे सारथी होकर भी
लगाम छोड़ बैठे हो?
कान्हा…
मैं युद्ध नहीं जीतना चाहती।
बस इतना चाहती हूँ—
जब मैं आख़िरी बार
तुम्हारी ओर देखूँ,
तो तुम वहाँ हो।
क्योंकि कहते हैं न—
तुम देर से आते हो,
पर अंधेर नहीं करते।
तो फिर आओ न, कान्हा…
मेरे डूबने से पहले।
-अपूर्वा यादव कम्बोज
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