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राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाते हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ।अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था।तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
.राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी।जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया।वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी ।
वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था।
अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी।
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उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।
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बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी- कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।
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इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।।
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इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता।
मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
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राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है।
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बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।
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राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।
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वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।
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राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
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.कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा,” परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ?
परीक्षित ने उत्तर दिया,” भगवन् ! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है।
उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। ”
श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा,” हे राजा परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।
इस मल-मूल की गठरी देह ( शरीर ) में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?”
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.राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।
.एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा।
.और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया (और पैदा होते ही रोने लगता है)
फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।
🚩जय श्री हरि 🚩
🚩जय सियाराम 🚩
आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व दिल्ली में परमेष्ठी नाम का काले रंग का एक कुबड़ा दर्जी रहता था। वह हृदय से भगवान का भक्त था। उसकी पत्नी का नाम था विमला। उसके एक पुत्र और दो कन्याएँ थीं।
उसे स्त्री पुत्रादि का कोई मोह नहीं था। भगवान नाम में उसकी अपार प्रीति थी। कपड़े सिलते सिलते वह नाम जप किया करता था। भक्त होने के साथ परमेष्ठी अपने काम में पूरा निपुण था। सिलाई के बारीक काम के लिए उसकी ख्याति थी। बड़े-बड़े अमीर, नवाब उसी से अपने वस्त्र सिलवाते थे। बादशाह को भी उसी के सिले वस्त्र पसंद आते थे।
एक बार बादशाह के सिंहासन के नीचे दो बढ़िया गलीचे उनके पैर रखने के लिए बिछाये गये। बादशाह को वे गलीचे पसंद नहीं आये। उन्होंने दो तकिये बनवाने का विचार किया। बहुमूल्य मखमल मँगाकर उस पर सोने के तारों के सहारे हीरे, माणिक, मोती जड़वाये गये। जड़ाऊ काम बादशाह को पसंद आया । परमेष्ठी को बुलवाकर बादशाह ने वह कपड़ा उन्हें दिया और उसके दो तकिए बनाने का आदेश दिया। परमेष्ठी वह रत्नजटित वस्त्र लेकर घर आ गये।
घर आकर परमेष्ठी ने उस वस्त्र के दो खोल बनाये। दोनों में इत्र से सुगन्धित रुई भरी। तकियों के ऊपर रत्नों के बने फूल-पत्ते जगमग करने लगे। इत्र की सुगन्ध से घर भर गया। ऐसे तकिये भला दर्जी अपने घर में कैसे रखे। वह उन्हें बादशाह के यहाँ ले जाने को उठ खड़ा हुआ ।
तकियों को उठाकर हाथ में लेते ही परमेष्ठी ने ध्यान से रत्नों की छटा देखी । उनके मन ने कहा–‘कितने सुन्दर हैंं ये तकिये? ये क्या एक सामान्य मनुष्य के योग्य हैं? इनके अधिकारी तो भगवान वासुदेव ही हैं।’ जैसे-जैसे इत्र की सुगन्ध नाक में पहुंचने लगी, वैसे-वैसे यह विचार और दृढ़ होने लगा।मन में द्वन्द्व चलने लगा–‘वह कारीगरी किस काम की, जो भगवान की सेवा में न लगे । परंतु मैं क्या करूँ? तकिए तो बादशाह के हैं।’
मन के असमंजस ने ऐसा रूप लिया कि परमेष्ठी को पता ही न चला कि वह कहाँ है, क्या कर रहा है । उस दिन जगन्नाथपुरी में रथयात्रा का महोत्सव था। परमेष्ठी एक बार जाकर रथयात्रा का महोत्सव देख आया था। आज भावावेश में जैसे रथयात्रा का वह प्रत्यक्ष दर्शन करने लगा । परमेष्ठी देख रहा है- — श्री जगन्नाथ जी रथ पर विराजमान हैं। सहस्त्रों नर नारी रस्सी पकड़कर रथ को खींच रहे हैं। कीर्तन हो रहा है , जयजयकार गूंज रहा है । सेवक गण एक के बाद एक वस्त्र बिछाते जा रहे हैं ।श्री जगन्नाथ जी एक वस्त्र से दूसरे वस्त्र पर पधारते हैं। सहसा रथ के कठिन आघात से जगन्नाथ जी के नीचे बिछाया हुआ वस्त्र फट गया। सेवक मन्दिर में दूसरा वस्त्र लेने दौड़े, पर उन्हें देर होने लगी। परमेष्ठी से यह दृश्य देखा नहीं गया। उन्होंने शीघ्रता से दो तकियों में से एक जगन्नाथ जी को अर्पण कर दिया। प्रभु ने उसे स्वीकार कर लिया। परमेष्ठी के आनन्द का पार नहीं रहा। वह आनन्द के मारे दोनों हाथ उठाकर नाचने लगा।
परमेष्ठी ने स्वप्न नहीं देखा था। सचमुच रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ स्वामी के नीचे का एक वस्त्र फट गया था और पुजारियों ने देखा कि किसी भक्त ने रथ पर एक बहुमूल्य रत्नजटित तकिया प्रभु को चढ़ा दिया है। यहाँ होश में आकर परमेष्ठी ने देखा कि एक तकिया गायब है । उसे बड़ा आनन्द हुआ। सर्वान्तरामी प्रभु ने उसके हृदय की बात जानकर एक तकिया स्वीकार कर लिया। अब उसे किसी का क्या भय।क्षुद्र बादशाह उसके प्राण ही तो ले सकता है । वह कहाँ मृत्यु से डरता है । उसके दयामय प्रभु ने उस पर इतनी कृपा की।वह तो आनन्द के मारे कीर्तन करता हुआ नाचने लगा।
बादशाह के सिपाही उसे बुलाने आये। एक तकिया लेकर वह बादशाह के पास पहुंचा । बादशाह तकिये की कारीगरी देखकर बहुत सन्तुष्ट हुआ। उसने दूसरे तकिये की बात पूछी। परमेष्ठी ने निर्भयता पूर्वक कहा– उसे तो श्री जगन्नाथ स्वामी ने स्वीकार कर लिया। पहले तो बादशाह ने परिहास समझा। वह बार बार पूछने लगा। जब दर्जी ने यही बात अनेक बार कही, तब बादशाह को क्रोध आ गया। उन्होंने परमेष्ठी को कारागार में डालने का आदेश दे दिया।
परमेष्ठी कारागार की अँधेरी कोठरी में पड़े-पड़े प्रभु का स्मरण कर रहे थे। सहसा हथकड़ी टूट गयी, तड़ाक-तड़ाक करके बेड़ियों के टुकड़े उड़ गये। भड़भड़ाकर बंदीगृह की कोठरी का द्वार खुल गया। परमेष्ठी के सामने एक अपूर्व ज्योति प्रकट हुई। दूसरे ही क्षण शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी प्रभु ने उन्हें दर्शन दिया। परमेष्ठी आनन्दमग्न होकर प्रभु के चरणों में गिर गए। प्रभु ने कहा–‘परमेष्ठी ! मेरे भक्त से अधिक बलवान संसार में और कोई नहीं है ।किसका साहस है जो मेरे भक्त को कष्ट दे। आ बेटा! मेरे पास आ।’
परमेष्ठी तो कृतार्थ हो गये। प्रभु ने अपने चरणों पर गिरते हुए उन्हें उठाया।उनके मस्तक पर अपना अभय कर रखा। उन्हें मुक्त करके वे अन्तर्धान हो गये।
उधर बादशाह ने स्वप्न में एक बड़ा भयंकर पुरुष देखा। जैसे साक्षात् महाकाल अपना कठोर दण्ड उठाकर उसे पीट रहे हों और गर्जन करके कहते हों—‘ तू परमेष्ठी को कैद करेगा? तू? अपना भला चाहता है तो मेरे भक्त को तुरन्त छोड़ दे।बादशाह डर के मारे चीखकर जाग गया। वह थर-थर कांप रहा था।उसका अंग-अंग दर्द कर रहा था।शरीर पर प्रहार के स्पष्ट चिन्ह थे।सवेरा होते ही उसने मन्त्रियों से स्वप्न की बात कही।सबको लेकर वह कैदखाने गया। वहाँ पहरेदार सोये पड़े थे। परमेष्ठी की हथकड़ी-बेड़ी टूटी हुयी थी। उनके शरीर से दिव्य तेज निकल रहा था। वे ध्यान में मग्न थे। ध्यान टूटने पर वे व्याकुल से होकर रोने लगे। बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ । उसने परमेष्ठी से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। नाना प्रकार के वस्त्र आभूषणों से सुसज्जित करके हाथी पर बैठाकर गाजे-बाजे के साथ उन्हें शहर लाया गया। बहुत सा धन दिया उसने। चारों ओर भक्त परमेष्ठी का जय-जयकार होने लगा।
परमेष्ठी को यह मान प्रतिष्ठा बिल्कुल नहीं अच्छी लगी। प्रतिष्ठा से बचने के लिए दिल्ली छोड़कर वे दूसरी जगह चले गये और वहीं रहकर पूरा जीवन उन्होंने भगवान के भजन पूजन मे व्यतीत किया।
Want to laugh without needing to read too much. Just read these funny one-liners :
Did you love the one-liners. I will be back soon with few more.
Apoorva Yadav Kamboj.
सुदामा और कृष्णा जी की मित्रता बहुत प्रसिद्ध है | सुदामा और कृष्णा दोनों ऋषि सांदीपनि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे | सुदामा एक गरीब ब्राह्मण परिवार से थे और कृष्णा एक संपन्न परिवार से फिर भी दोनों की मित्रता बहुत ही गहरी थी | सुदामा के बारे में एक कथा बहुत प्रचिलित है की बचपन में उन्होंने कृष्णा से छुपा कर चने खाये थे जो की उनकी गुरु माता ने दोनों को बराबर बाँट के खाने के लिए दिए थे | लोगो का मानना है की इसी कारण सुदामा गरीब ही रह गए थे | पर सुदामा ने अपने इतने घनिष्ट मित्र से छुपकर चने क्यों खाये और उनके पूछने पर की खाने के लिए कुछ है क्या, झूठ क्यों बोला ? इस के पीछे एक नेक कारण था जो की इस पौराणिक कहानी से हमे पता चलता है |
पौराणिक कथा के अनुसार एक ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी। भिक्षा मांग कर जीवन व्यतीत करती थी। एक समय ऐसा आया कि पांच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली वह प्रतिदिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले। कुटिया पे पहुंचते-पहुंचते रात हो गई। ब्राह्मणी ने सोचा अब ये चने रात मे नहीं खाऊंगी सुबह भगवान को भोग लगाकर फिर खाऊंगी। यह सोचकर ब्राह्मणी चनों को कपड़े में बांधकर रख दिया और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गई।
लेकिन कुछ समय बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गए। इधर-उधर बहुत ढूंढा चोरों को कुछ नहीं मिला लेकिन वे चनों की बंधी पोटली चुराकर ले गए। क्योंकि उनको उस पोटला में सोने के सिक्के लगे। इतने में ब्राह्मणी जाग गई और शोर मचाने लगी। गांव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौड़े। चोर वो पोटली लेकर भागे। पकड़े जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गए, जहां भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे।
कुछ समय बाद चोर उस आश्रम से भी भाग गए लेकिन वे चनों की पाटली वहीं पर भूल गए। इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि, मुझ दीनहीन असहारा के जो भी चने खाएगा वह दरिद्र हो जाएगा। प्रात:काल गुरु माता आश्रम में झाड़ू लगाने लगी और उन्हें वही चने की पोटली मिली। गुरु माता ने पोटली खोल के देखी तो उसमें चने थे। सुदामा और कृष्ण भगवान जंगल से लकड़ी लाने जा रहे थे। तो गुरु माता ने वह चने की पोटली सुदामा को दी और कहा बेटा कि भूख लगे तो खा लेना।
सुदामा तो जन्मजात से ही ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही चने की पोटली सुदामा ने अपने हाथ में ली त्यों ही उन्हें सारा रहस्य मालुम हो गया। सुदामा जी ने सोचा गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग बराबर बांट के खाना। लेकिन ये चने अगर मैंने श्री कृष्ण को खिला दिए तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जाएगी। मैं ऐसा नहीं करुंगा, मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जाएं ऐसा कदापि नहीं होगा।
तो इसी बात के डर से सुदामा ने सारे चने खुद खा लिए। दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया। लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चने का नहीं दिया। ऐसे निभाई सुदामा ने अपनी दोस्ती और खुद बन गए गरीब।
Apoorva Yadav Kamboj
Read in Punjab Kesari.
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चढ़ती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फ़िसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा-जा कर खाली हाथ लौट कर आता है
मिलते न सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
असफ़लता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद-चैन को त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
– सोहन लाल द्विवेदी
नीता अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश थी | अपने पति गौरव और बेटी सुनयना के साथ उसका जीवन बहुत सुखद था| उसके पति गौरव भी उसे बहुत प्यार करते थे, उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखते थे| बस उनमे गुस्सा बहुत ज़्यादा था | बात बात पर उसपे झल्ला पड़ते| कभी कभी तो अपने काम, दोस्तों या किसी और का गुस्सा भी उसपे उतार देते| नीता को बात थोड़ी बुरी तो लगती पर वो काम का बोझ समझकर कोई जवाब ना देती| थोड़ी देर में गौरव का गुस्सा शांत हो जाता और सब कुछ नार्मल हो जाता| धीरे धीरे गौरव दुसरो के सामने भी नीता पे चिल्लाने लगा| नीता को ये बात बहुत बुरी लगती|पर नीता को पता था की चुप रहकर और बात को आगे न बढाकर ही गौरव को शांत किया जा सकता है| घर का माहौल सही रहे और बेटी पर बुरा असर ना हो इस कारण नीता हमेशा चुप ही रहती|
कुछ दिन से नीता देख रही थी की सुनयना काफी शांत रहने लगी थी| जो लड़की घर में हमेशा उधम मचाती रहती थी वो अब स्कूल से आकर सीधा अपने कमरे में चली जाती थी और पूरा दिन वही बिताती | यहाँ तक की जब खाना खाने बहार आती तो भी बिलकुल चुप चुप ही रहती| नीता ने कई बार उससे पूछा की क्या बात है पर सुनयना हमेशा कुछ भी नहीं बस थक गयी हूँ कहकर बात को टाल देती | गौरव भी इस बात पर गौर कर रहा था| नीता और गौरव ने सुनयना की दोस्त सुरभि से बात करनी की सोची| दोनों सुरभि के घर गए और सुरभि से पूछा की सुनयना इतनी शांत क्यों रहने लगी थी | सुरभि ने उन्हें बताया की क्लास के कुछ बच्चे सुनयना को बहुत चिढ़ाते हैं और सुनयना इस कारण बहुत परेशान रहती है| ये सुनकर गौरव और नीता को बहुत दुःख हुआ और दोनों इस बात से हैरान थे की सुनयना ने ये बात उन्हें क्यों नहीं बताई| पहले तो सुनयना अपनी हर बात उन दोनों को बताती थी | यही सोचते सोचते दोनों घर पहुँच गए और उन्होंने सुनयना को अपने पास बुलाया |
नीता ने बड़े प्यार से सुनयना के सर पे हाथ फेरते हुए पूछा की बेटा क्या बात है, तुम क्यों इतनी परेशान रहती हो? जब आज भी सुनयना कुछ नहीं बोली तो नीता ने उससे फिर कहा की हमे सब कुछ पता है बेटा, हम अभी सुरभि से बात करके आ रहे हैं |ये सुनते ही सुनयना रोने लगी और नीता के गले लग गयी | गौरव से यह सब देखा नहीं जा रहा था | उसने सुनयना से पूछ ही लिया की बेटा तुमने हमे कुछ बताया क्यों नहीं ? और अगर बच्चे तुम्हे कुछ कहते थे तो तुमने कभी उन्हें जवाब क्यों नहीं दिया? सब कुछ चुपचाप क्यों सेहती रहीं ? डबडबाई आँखों से सुनयना बोली जब आप मम्मी पर गुस्सा करते हो तो मम्मी कभी भी जवाब नहीं देतीं जिससे बात बिगड़ ना जाये, तो मुझे भी यही लगा की शायद चुप रहने से ही सब ठीक हो जायेगा | आज नीता को एहसास हुआ की चुप रहकर वो सुनयना को बचा नहीं रही थी बल्कि उसे डरपोक बना रही थी | ये बात सही है की कभी कभी रिश्तों को बचाने के लिए हमे चुप रहना पड़ता है पर आत्मसम्मान के लिए लड़ना या आवाज़ उठाना भी उतना ही ज़रूरी है | गौरव को भी ये एहसास हो गया की बिना वजह नीता पर चिल्लाने से वो ना ही सिर्फ अपने और नीता के रिश्ते को ख़राब कर रहा था बल्कि सुनयना के कोमल मन को भी ठेस पहुंचा रहा था | दोनों ने अपने आप को बदलने का निश्चय किया और सुनयना को भी अपने लिए आवाज़ उठाने की शिक्षा दी | उसे यह भी समझाया की किसी मुसीबत में पड़ने पर अपने से बड़ो चाहे माता पिता या शिक्षक को सूचित करना चाहिए | और हमे भी ये याद रखना चाहिए की हमारा हर एक व्यवहार हमारे बच्चो पर बहुत प्रभाव डालता है |
Apoorva Yadav Kamboj
Even in the most crowded place surrounded by lots of friends, family, colleagues, neighbors, knowns or unknowns we feel utterly alone. We see people smiling, laughing, and enjoying but we still feel completely out of place. We long to be like others, to belong with others, and live life carefree just like we see others doing. It seems we are different, somehow lacking in some way hence we cannot be a part of a big happy group. We try hard to mingle, to seem like we belong while feeling conscious of our words, our every step, even the way we laugh, we eat or we sit. We are so busy in our own heads analyzing ourselves and everything around us that we fail to be present in the moment wholeheartedly. Whenever we are alone we want to be in the company of others but whenever we are with other people we feel anxious and look forward to the comfort zone of our home. We often question ourselves why are we unable to be happy when everybody around us is happy and perfect. Why does everyone we know have so perfect lives when we are struggling to even live each day. Even when we smile it feels so strange, so awkward like this isn’t who we are. When we pretend to laugh with others it seems forced and an unnatural thing to do. Do these thoughts seem familiar? Are you often plagued by these thoughts? What can we do to avoid them, read on to know :
I hope this helps. If you are still feeling a little low, feel free to connect with me on sharing sorrows column.
Apoorva Yadav Kamboj.
श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था ।
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जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते ।
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एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई नहीं मिला। वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे ।
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पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ?
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संत ने कहा – पंडित जी , रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है । माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा ।
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पंडित जी ने कहा – ठीक है महाराज । संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे ।
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पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती ।
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संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।
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जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा – पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी ।
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हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए पैसे तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो ।
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संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे ।
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पंडित जी बोले – महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये ।
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संत बोले – संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये ।
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भगवान् ने मुस्कुरा दिया, संत बोले – तथास्तु ।
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फिर संत ने पूछा – मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले – हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए ।
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संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए । संत बोले – तथास्तु, तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा ।
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फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले – श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो ।
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संत बोले – नहीं ! यह नहीं मिलेगा ।
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पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए । पंडित जी ने पूछा – संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी ।
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संत बोले – तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् की भक्ति की है ।
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जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती ।
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भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा ।
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प्रभु ने पूछा – तुम्हे बहुत सा धन देते है, केवट बोला नहीं ।
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प्रभु ने कहा – ध्रुव पद ले लो ,केवट बोला – नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राज्य, और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की ।
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हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए – बल, बुद्धि, सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई ।
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अंत में जानकी जी ने श्रीराम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया ।
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प्रह्लाद जी ने भी कहा की हमांरे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की ।
अर्थात—आप भी प्रभु से उनकी भक्ति का वरदान मांगों …और बाकी सब तो प्रभु जानते है ..तुम्हे क्या जरूरत है वो सब सांसारिक चींजें स्वम देते है वो घट-घट के वासी है…..
🌹🔱🌹ॐ जय श्रीराम🌹🔱🌹
जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम
Source: This story has been taken from a Facebook post.
“So far as I am able to judge, nothing has been left undone, either by man or nature, to make India the most extraordinary country that the sun visits on his rounds. Nothing seems to have been forgotten, nothing overlooked.”- Mark Twain.
In continuation of the previous blog where we learned some interesting facts on the geography of India, in this blog we shall cover some infrastructural facts of India. Read on to find more reasons to admire this beloved country’s infrastructure :
Thankyou for reading and let me know if you have something to add on in these facts. If you want to read the Geographical Facts please click the link below.
Facts About India- Part 1 (Geographical)
Apoorva Yadav Kamboj